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Thursday, 15 November 2018
खाटू श्याम ओर उनके भक्त
*बाबा के एक दास की विनती सुन लो....* *जो भी ये पोस्ट पढ़ रहे है वो अगर हर तरह से सम्पन्न है तो जो लोग किसी तरह के संम्पन्न लोग है तो जो परेशान चल रहे है उनको खाटूश्यामजी का रास्ता जरूर बता देना।* *कहते थे श्री आलूसिंह जी प्रभु का सच्चा दरबार है*, *सच्चे मन से जो कोई ध्यावे उसका बेड़ा पार है* *बाबा को हारे का सहारा इसीलिये नहीं कहा जाता है कि उन्हें अपनी माता मोर्वी से हारे हुए की जीत कराने का वरदान मिला था, जब श्रीकृष्ण ने वीर बर्बरीक को कलियुग का राजा बनने का वरदान दिया तब ये कहा था कि दुनिया मुझे सबसे बड़ा योगी कहती है कि तीनों लोकों में जिस किसी की किस्मत में मैंने दुख लिख दिया उसको सुख में परिवर्तित करने वाला कोई नहीं है, और जिसकी किस्मत में मैंने सुख, ऐशो आराम लिख दिया उसे दुखी करने वाला कोई नहीं है, जिसकी किस्मत को मैंने अगर दुखों, संघर्ष एवं कमियों से भर दिया है उसे कोई नहीं बदल सकता है, लेकिन हे वीर बर्बरीक कोई अगर किस्मत का मारा* *जिसकी किस्मत में मैंने दुख लिखे हैं और कलियुग में वो तेरे दर पर आ गया तो तेरे दरबार में मेरा लिखा हुआ भी बदल जाएगा।* *पूरी कायनात में खाटू नरेश का ही एक दरबार है जहां भगवान का लिखा भी बदल जाता है। बाबा केवल भाव का भूखा है इसे* *किसी प्रकार के हीरे मोती या सोने चांदी के दरबार से नहीं केवल अपने भाव भरे आँसुओं से श्याम प्रेमी रिझाते हैं और अपनी किस्मत बदलते हैं।* *बाबा श्याम के भरोसे जो अपनी जीवन गाड़ी सौंपते हैं उनकी फिक्र फिर बाबा श्याम रखते हैं।* *बस मेरी विनती है कोई दीन दुखी है तो उसे रास्ता बताये बाबा के दरबार पहुंचाये उसकी किस्मत की खराब रेखाएं खुद लापता हो जाएँगी। ईश्वर हमें हर जगह नहीं मिल सकता इसलिए पुराने लोगों ने मंदिर बनवाए और हमारा जब भी कोई दुख और दर्द होता है तो हम उस पत्थर वाली मूर्ति के सामने जाकर हाथ जोड़ते हैं और अपने मन की बात बोलते हैं और हम ऐसा भी बोलते हैं कि हे ईश्वर यदि मेरा यह काम सफल हुआ तो मैं आपके यहां पर ₹101 का प्रसाद चढ़ा लूंगा या फिर मैं 11:00 ₹100 का प्रसाद चढ़ा लूंगा और इंसान ईश्वर में इतना आशिक हो जाता है तो एक खाटू श्याम बाबा का जो मंदिर है वहां पर कहा जाता है कि हारे का सहारा बाबा श्याम हमारा जो लोग हार जाते हैं जो लोग निराश हो जाते हैं जो लोग कमजोर हो जाते हैं जिंदगी से वह श्याम बाबा खाटू श्याम बाबा के यहां पर आते हैं और बाबा उनका बेड़ा पार लगाते हैं तभी तो कहा जाता है कि हारे का सहारा बाबा श्याम हमारा हम सब उस मंदिर में जाइए और वहां पर एक बार अपना शीश झुकाया और गुजरात के सूरत में हर साल बाबा श्याम जी का जन्म दिवस मनाया जाता है और वहां पर बहुत ही बड़ा मंदिर भी बनवाया है और धूमधाम से वह लोग भजन गाते बाबा श्याम के और आने वाले भक्तों को मिठाई प्रसाद और भोजन भी करवाया जाता है मैं तो कहूंगा कि बाबा श्याम आप उन सब लोगों को हमेशा सुखी रखना जो इस तरह से लोगों की सेवा करते हैं जय बाबा श्याम जी खाटू श्याम ॐ श्री श्याम शरणम ममः बाबा तू मेरा और मैं तेरा हारे के सहारे की जय हो बोलिये प्रेम से जय जय श्री श्याम
माँ लक्ष्मी को प्रसन्न कैसे करे
शास्त्रों के अनुसार प्रत्येक पूर्णिमा ( Purnima ) के दिन सुबह लगभग 10 बजे पीपल के वृक्ष पर मां लक्ष्मी का आगमन होता है। कहते है कि जो व्यक्ति इस दिन सुबह उठकर नित्य कर्मों से निवृत्त होकर पीपल के पेड़ पर कुछ मीठा रखकर मीठा जल अर्पण करके धूप अगरबत्ती जला कर मां लक्ष्मी का पूजन करें और माता लक्ष्मी को अपने घर पर निवास करने के लिए आमंत्रित करें तो उस जातक पर लक्ष्मी की कृपा सदा बनी रहती है। सफल दाम्पत्य जीवन के लिए प्रत्येक पूर्णिमा ( Purnima ) को पति पत्नी में कोई भी चन्द्रमा को दूध का अर्ध्य अवश्य ही दें ( दोनों एक साथ भी दे सकते है) , इससे दाम्पत्य जीवन में मधुरता बनी रहती है। जिस भी व्यक्ति को जीवन में धन सम्बन्धी समस्याओं का सामना करना पड़ता है उन्हें पूर्णिमा के दिन चंद्रोदय के समय चन्द्रमा को कच्चे दूध में चीनी और चावल मिलाकर "ॐ स्रां स्रीं स्रौं स: चन्द्रमासे नम:" अथवा " ॐ ऐं क्लीं सोमाय नम:। " मन्त्र का जप करते हुए अर्ध्य देना चाहिए । इससे धीरे धीरे उसकी आर्थिक समस्याओं का निराकरण होता है । पूर्णिमा के दिन भगवान शिव को सफ़ेद चंदन एवं सफ़ेद फूल चढ़ाते हुए साबूदाने की खीर का भोग लगाएं, परिवार में सुख सौभाग्य की वर्षा होगी, रोग और संकट दूर रहते है | पूर्णिमा के दिन अपनी समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु दूध में शहद एवं चन्दन मिलाकर छाया देखकर चंद्रमा को अर्घ्य दें। पूर्णिमा के दिन मां लक्ष्मी के चित्र पर 11 कौड़ियां चढ़ाकर उन पर हल्दी से तिलक करें । अगले दिन सुबह इन कौड़ियों को लाल कपड़े में बांधकर अपनी तिजोरी में रखें। इस उपाय से घर में धन की कोई भी कमी नहीं होती है। इसके पश्चात प्रत्येक पूर्णिमा के दिन इन कौड़ियों को अपनी तिजोरी से निकाल कर माता के सम्मुख रखकर उन पर पुन: हल्दी से तिलक करें फिर अगले दिन उन्हें लाल कपड़े में बांध कर अपनी तिजोरी में रखे। आप पर माँ लक्ष्मी की कृपा बनी रहेगी । हर पूर्णिमा के दिन मंदिर में जाकर लक्ष्मी को इत्र और सुगन्धित अगरबत्ती अर्पण करनी चाहिए । इत्र की शीशी खोलकर माता के वस्त्र पर वह इत्र छिड़क दें , उस अगरबत्ती के पैकेट से भी कुछ अगरबत्ती निकल कर जला दें फिर धन, सुख समृद्धि और ऐश्वर्य की देवी माँ लक्ष्मी से अपने घर में स्थाई रूप से निवास करने की प्रार्थना करें । हर जातक को अपने घर के मंदिर में प्रेम, शुभता और धन लाभ के लिए श्री यंत्र, व्यापार वृद्धि यंत्र, कुबेर यंत्र, एकाक्षी नारियल, दक्षिणवर्ती शंख आदि माता लक्ष्मी की प्रिय इन दिव्य वस्तुओं को अवश्य ही स्थान देना चाहिए । इनको साबुत अक्षत के ऊपर स्थापित करना चाहिए और हर पूर्णिमा को इन चावलों को जिनको आसान के रूप में स्थान दिया गया है उन्हें अवश्य ही बदल कर नए चावल रख देना चाहिए । पुराने चावलों को किसी वृक्ष के नीचे अथवा बहते हुए पानी में प्रवाहित कर देना चाहिए । पूर्णिमा की रात में 15 से 20 मिनट तक चन्द्रमा के ऊपर त्राटक करें अर्थात चन्द्रमा को लगातार देखें इससे नेत्रों की ज्योति तेज होती है एवं पूर्णिमा की रात में चन्द्रमा की रौशनी में सुई में धागा पिरोने का अभ्यास करने से नेत्र ज्योति बढती है । आयुर्वेद के अनुसार पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा की चाँदनी सभी मनुष्यों के लिए अत्यंत लाभदायक है। यदि पूर्णिमा ( Purnima ) के दिन चन्द्रमा का प्रकाश गर्भवती महिला की नाभि पर पड़े तो गर्भ पुष्ट होता है अत: गर्भवती स्त्रियों को तो विशेष रूप से कुछ देर अवश्य ही चन्द्रमा की चाँदनी में रहना चाहिए ।
चरणामृत का क्या महत्व है?
चरणामृत का क्या महत्व है? अक्सर जब हम मंदिर जाते है तो पंडित जी हमें भगवान का चरणामृत देते है.क्या कभी हमने ये जानने की कोशिश की.कि चरणामृत का क्या महत्व है. शास्त्रों में कहा गया है अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्। विष्णो: पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ।। “अर्थात भगवान विष्णु के चरण का अमृतरूपी जल समस्त पाप-व्याधियों का शमन करने वाला है तथा औषधी के समान है।,जो चरणामृत पीता है उसका पुनः जन्म नहीं होता” जल तब तक जल ही रहता है जब तक भगवान के चरणों से नहीं लगता,जैसे ही भगवान के चरणों से लगा तो अमृत रूप हो गया और चरणामृत बन जाता है. जब भगवान का वामन अवतार हुआ,और वे राजा बलि की यज्ञ शाला में दान लेने गए तब उन्होंने तीन पग में तीन लोक नाप लिए जब उन्होंने पहले पग में नीचे के लोक नाप लिए और दूसरे में ऊपर के लोक नापने लगे तो जैसे ही ब्रह्म लोक में उनका चरण गया तो ब्रह्मा जी ने अपने कमंडलु में से जल लेकर भगवान के चरण धोए और फिर चरणामृत को वापस अपने कमंडल में रख लिया.वह चरणामृत गंगा जी बन गई,जो आज भी सारी दुनिया के पापों को धोती है,ये शक्ति उनके पास कहाँ से आई ये शक्ति है भगवान के चरणों की.जिस पर ब्रह्मा जी ने साधारण जल चढाया था पर चरणों का स्पर्श होते ही बन गई गंगा जी .जब हम बाँके बिहारी जी की आरत गाते है तो कहते है – “चरणों से निकली गंगा प्यारी जिसने सारी दुनिया तारी “ धर्म में इसे बहुत ही पवित्र माना जाता है तथा मस्तक से लगाने के बाद इसका सेवन किया जाता है। चरणामृत का सेवन अमृत के समान माना गया है। कहते हैं भगवान श्री राम के चरण धोकर उसे चरणामृत के रूप में स्वीकार कर केवट न केवल स्वयं भव-बाधा से पार हो गया बल्कि उसने अपने पूर्वजों को भी तार दिया। चरणामृत का महत्व सिर्फ धार्मिक ही नहीं चिकित्सकीय भी है। चरणामृत का जल हमेशा तांबे के पात्र में रखा जाता है। आयुर्वेदिक मतानुसार तांबे के पात्र में अनेक रोगों को नष्ट करने की शक्ति होती है जो उसमें रखे जल में आ जाती है। उस जल का सेवन करने से शरीर में रोगों से लडऩे की क्षमता पैदा हो जाती है तथा रोग नहीं होते। इसमें तुलसी के पत्ते डालने की परंपरा भी है जिससे इस जल की रोगनाशक क्षमता और भी बढ़ जाती है। तुलसी के पत्ते पर जल इतने परिमाण में होना चाहिए कि सरसों का दाना उसमें डूब जाए। ऐसा माना जाता है कि तुलसी चरणामृत लेने से मेधा, बुद्धि, स्मरण शक्ति को बढ़ाता है। इसीलिए यह मान्यता है कि भगवान का चरणामृत औषधी के समान है। यदि उसमें तुलसी पत्र भी मिला दिया जाए तो उसके औषधीय गुणों में और भी वृद्धि हो जाती है। कहते हैं सीधे हाथ में तुलसी चरणामृत ग्रहण करने से हर शुभ काम या अच्छे काम का जल्द परिणाम मिलता है। इसीलिए चरणामृत हमेशा सीधे हाथ से लेना चाहिये, लेकिन चरणामृत लेने के बाद अधिकतर लोगों की आदत होती है कि वे अपना हाथ सिर पर फेरते हैं। चरणामृत लेने के बाद सिर पर हाथ रखना सही है या नहीं यह बहुत कम लोग जानते हैं? दरअसल शास्त्रों के अनुसार चरणामृत लेकर सिर पर हाथ रखना अच्छा नहीं माना जाता है। कहते हैं इससे विचारों में सकारात्मकता नहीं बल्कि नकारात्मकता बढ़ती है। इसीलिए चरणामृत लेकर कभी भी सिर पर हाथ नहीं फेरना चाहिए। जिस गांव शहर और कस्बे में भगवान का मंदिर बना होता है वहां पर जो पूजा करने वाले पुजारी दिया जो पंडित जी होते हैं वह सुबह सुबह नित्य रोज नहा धोकर के मंदिर में आते हैं और सबसे पहले भगवान के यहां पर झाड़ू और साफ-सफाई करते हैं उसके बाद ईश्वर को नए लाते बुलाते हैं और जब ईश्वर को नहलाना और भुला ना होता है जो ईश्वर के ऊपर जो पानी आता है वह पानी उनके पैरों से लेकर किसी प्लेट या बर्तन में डाल दिया जाता है और जो पेड़ का पानी होता है उसको चरण का पानी कैसे और फिर उस पानी को अमृत समझा जाता है इसलिए उसको चरणामृत कहा जाता है और चरणामृत लेने के बाद इंसान के रूप है भूल जाते हैं और आत्मा के अंदर एक नई अनुभूति और एक नया अनुसार पैदा हो जाता है तू कहां जाता है कि आप जब भी मंदिर जाओ तो चरणामृत जरूर लो और माथे के ऊपर चंदन की टिक्की लगाओ जय श्रीराम जय श्रीराम “जय जय श्री राधे”
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